तालिबान मुश्किल में, मुल्ला अखुंद ने इस्लामिक देशों से किया ये आग्रह

तालिबान के प्रधानमंत्री ने बुधवार को इस्लामिक देशों से अपनी सरकार को मान्यता देने का आग्रह किया है. विदेशी मदद पर निर्भर अफ़ाग़ानिस्तान इन दिनों आर्थिक रूप से बिखर चुका है.

अभी तक किसी भी देश ने तालिबान को मान्यता नहीं दी है. अभी हर कोई देख रहा है कि कट्टरपंथी इस्लामिक सोच रखने वाला तालिबान इस बार कैसे शासन को आगे बढ़ाता है. पहली बार 1996 में तालिबान जब अफ़ग़ानिस्तान की सत्ता में आया था तो मानवाधिकारों के हनन के लिए कुख्यात साबित हुआ था.

हालांकि इस बार तालिबान ने कहा है कि इस्लामिक शरिया क़ानून को लेकर उदार रहेगा. लेकिन अभी तालिबान की सरकार में महिलाओं को सरकारी नौकरियों से बाहर कर दिया गया है और लड़कियां स्कूल भी नहीं जा पा रही हैं.

बुधवार को काबुल में एक प्रेस कॉन्फ़्रेंस को संबोधित करते हुए तालिबान के प्रधानमंत्री मुल्ला मोहम्मद हसन अखुंद ने कहा, ”मैं मुस्लिम देशों से अपील करता हूँ कि वे हमें आधिकारिक रूप से मान्यता दें. इसके बाद हमें उम्मीद है कि विकास की राह पर तेज़ी से बढ़ सकेंगे. मैं यह अपनी सरकार के लिए नहीं बल्कि यहाँ के लोगों के लिए चाहता हूँ. तालिबान ने शांति और सुरक्षा बहाल करने के लिए सभी ज़रूरी शर्ते पूरी की हैं.”

तालिबान के प्रधानमंत्री मुल्ला मोहम्मद हसन अखुंद

इस्लामिक देशों से अपील

अफ़ग़ानिस्तान के टोलो न्यूज़ के अनुसार, मुल्ला अखुंद ने कहा, ”इस्लामिक देशों के मान्यता देने के मामले में और इंतज़ार नहीं करना चाहिए. मान्यता नहीं मिलने के कारण हमें कई स्तरों पर समस्या का सामना करना पड़ रहा है. अगर आर्थिक प्रक्रिया शुरू हो जाती है तो अफ़ग़ानिस्तान वर्तमान संकट से बाहर निकल सकता है.

अफ़ग़ानिस्तान अभी मानवीय आपदा में समाया हुआ है. पिछले साल अगस्त महीने में जब तालिबान ने अफ़ग़ानिस्तान की सत्ता पर क़ब्ज़ा किया तब से पश्चिमी देशों ने अंतरराष्ट्रीय मदद बंद कर दी और अरबों डॉलर की संपत्ति को को ज़ब्त कर लिया है. अफ़ग़ानिस्तान पहले की अमेरिका समर्थित सरकार में भी पूरी तरह से विदेशी मदद पर निर्भर था.

तालिबान के आने के बाद से सरकारी कर्मचारियों को भी सैलरी नहीं मिल पा रही है. बुधवार को अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन ने कहा था कि अफ़ग़ानिस्तान में 2021 की तीसरी तिमाही में पाँच लाख लोगों को नौकरियों से हाथ धोना पड़ा था और यह तादाद इस साल के मध्य तक नौ लाख हो जाएगी. महिलाओं पर सबसे बुरा असर पड़ा है. संयुक्त राष्ट्र ने कहा है कि अफ़ग़ानिस्तान की आधी आबादी खाद्य संकट से जूझ रही है.

क़तर के विदेश मंत्री शेख मोहम्मद बिन अब्दुलरहमान
क़तर के विदेश मंत्री शेख मोहम्मद बिन अब्दुलरहमान

इस्लामिक देशों में तालिबान को लेकर एक राय नहीं

लेकर इस्लामिक देशों में भी पर्याप्त आशंकाएं हैं. तालिबान को दोबारा सत्ता में लाने में पाकिस्तान की भूमिका को भी कई लोग संदिग्ध मानते हैं लेकिन पाकिस्तान ने भी अभी तक तालिबान की सरकार को औपचारिक मान्यता नहीं दी है. हालांकि पाकिस्तान के राजनयित संबंध अब भी हैं. क़तर तालिबान के साथ अमेरिका की वार्ता कराने में मध्यस्थ की भूमिका में था लेकिन उसने भी अब तक मान्यता नहीं दी है.

पिछले साल सितंबर में क़तर ने अफ़ग़ानिस्तान की कमान संभालने के बाद तालिबान के रुख़ से गहरी नाराज़गी जताई थी. क़तर ने कहा था कि लड़कियों पर तालिबान का फ़ैसला बेहद निराश करने वाला है. क़तर ने कहा था कि यह पीछे ले जाने वाला फ़ैसला है. क़तर के विदेश मंत्री शेख मोहम्मद बिन अब्दुलरहमान अल थानी ने कहा था कि तालिबान को क़तर में देखना चाहिए कि इस्लामिक शासन कैसे चलता है.

क़तर के विदेश मंत्री ने पिछले साल 30 सितंबर को यूरोपियन यूनियन विदेश नीति के प्रमुख जोसेफ़ बोरेल के साथ राजधानी दोहा में प्रेस कॉन्फ़्रेंस के दौरान ये बात कही थी. तालिबान ने सत्ता में आने के बाद अफ़ग़ान महिला सेकेंडरी स्कूलों को खोलने की अनुमति नहीं दी थी.

क़तर के विदेश मंत्री ने कहा था, ”अफ़ग़ानिस्तान में हाल के फ़ैसले दुर्भाग्यपूर्ण हैं. यह बहुत ही निराशाजनक है और पीछे ले जाने वाला फ़ैसला है.”

अफ़ग़ानिस्तान से अमेरिकी सैनिकों की वापसी के बाद से और उसके पहले से ही क़तर पूरे मामले में बेहद ख़ास रहा है. क़तर ने तालिबान के आने के बाद से काबुल एयरपोर्ट से हज़ारों की संख्या में विदेशी नागिरकों और अफ़ग़ानों को निकाला था.

तालिबान

REUTERS

क़तर को तालिबान से निराशा

शेख मोहम्मद ने कहा था, ”हमें इनके साथ लगे रहने की ज़रूरत है. हमें इनसे कहना होगा कि इस तरह के फ़ैसले ना लें. हमें ये भी बताने की ज़रूरत है ताकि तालिबान को समझ में आए कि मुस्लिम देश अपने नियमों से कैसे चल सकते हैं और वे कैसे महिलाओं के मुद्दे से निपटें.”

उन्होंने कहा था, ”तालिबान इस मामले में क़तर को ही मिसाल के तौर पर ले. हम भी मुस्लिम मुल्क हैं. हमारी व्यवस्था भी इस्लामिक है. क़तर के सरकारी और उच्च शिक्षा में पुरुषों की तुलना में महिलाएँ ज़्यादा हैं.”

हाल के हफ़्तों में तालिबान पर मानवाधिकारों के उल्लंघन के आरोप लगे हैं. यहाँ तक कि खुलेआम सड़कों पर हेरात में लोगों को फांसी भी दी गई थी.

सऊदी

तालिबान ने सत्ता में आने के बाद संदिग्धों को खुलेआम सड़क पर मौत की सज़ा दी है. लोगों का कहना है कि तालिबान एक बार फिर से 1996 से 2001 की शासन प्रणाली को अपनाता दिख रहा है. तालिबान इस्लामिक क़ानून की व्याख्या अपने हिसाब से कर रहा है और सबसे कड़ी पाबंदियों को अपना रहा है. महिलाओं पर इसका असर सबसे ज़्यादा पड़ रहा है.

1990 के दशक में जब तालिबान ने पहली बार सत्ता संभाली थी तो सिर्फ़ तीन देशों के उसके साथ औपचारिक रिश्ते थे. वे देश थे- पाकिस्तान, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात.

लेकिन अमेरिका में 11 सितंबर 2001 के हमलों के बाद ये संबंध ख़त्म हो गए. हालाँकि, सऊदी अरब से कुछ लोग कई सालों तक चोरी-छिपे फ़ंडिंग करते रहे. सऊदी अधिकारी इस बात इनकार करते हैं कि वे तालिबान को किसी भी औपचारिक रूप से मदद करते हैं.