माह-ए-रमजान: अकीदत के साथ रविवार को रखा गया पहला रोजा

नई दिल्ली

माह-ए-रमजान की चांद का खबर होने के साथ शनिवार देर शाम से जहां मुस्लिम समुदाय के लोग इबादत एवं रोजे की तैयारी में जुट गए थे। वहीं रविवार को पहला रोजा रखा। रोजा शुरू होने से लोगों में एक नई ताजगी आ गई है। कई मोहल्लों को आकर्षक तरीके से सजाया गया है। लोग रोजा, नमाज पवित्र ग्रंथ कुरान शरीफ की तिलावत में मशगूल हो गए हैं। रमजान आने से मुस्लिम समुदाय के मोहल्लों में उत्साह व उमंग देखा जा रहा है।

मौलाना अंजार आलम ने कहा कि माह-ए-रमजान रहमत व बरकत की बारिश का ऐसा महीना है जिसमें हर तरफ इबादत का सिलसिला चलता है। रमजान-उल-मुबारक का महीना मुसलमानों के लिए सबसे अफजल महीना माना गया है। इस्लाम को मानने वाले इस माह के तीस दिनों तक रोजा रखकर खुदा की बारगाह में सजदा करते हैं और अपनी गुनाहों की माफी मांगते है। मान्यता है कि रमजान माह में जहां सभी शैतान को कैद कर लिया जाता है। वहीं जन्नत के तमाम का दरवाजे खोल दिए जाते हैं। माह-ए-रमजान को लेकर बच्चों व युवाओं में खासा उत्साह देखा जा रहा है।

मान्यता है कि रमजान के मुकद्दश महीने के दिन और रात बेसकिमती माना गया है। रमजान माह में अल्लाह अपने बंदों पर रहमत नाजील फरमाते हैं। उन्होंने कहा कि रोजा के दौरान हम अपने आमाल का जायजा लें और गलतियों पर निगाह डालें ताकी आने वाले दिनों में फिर से गलती न दुहरायी जाय। माह -ए -रमजान में रोजा का पुरा हक अदा करते हुए अल्लाह से माफी मांगनी चाहिए। रोजा इस्लाम की पांच रत्नों में से एक है। इस्लाम धर्म में पांच बुनियादी चीजें शमिला हैं। तौहीद, नमाज, रोजा, जकात व हज रोजा फजल- ए -खुदाबंदी का हक अदा करती है। हदीश में कहा गया है की इस माह में बंदो द्वारा एक नेकी करने से उसे 70 नेकियों के बराबर शबाब मिलता है।

सब्र का महीना है रमजान:

रमजान माह सब्र का महीना होता है। जो आदमी सुबह से शाम तक खाने पीने या किसी भी ख्वाहिस से बचा रहा और सब्र के साथ शबाब के उम्मीद से जिसने भी रोजा किया उसे जन्नत नसीब होती है। रमजान का महीना अल्लाह का इंसान के लिए अनमोल तोहफा है। मौलाना इंखाबुर रहमान ने बताया कि इंसान के लिए अल्लाह का अनमोल तोहफा रोजा है। यह रोजा एक इंसान को दुनिया की सारी हकीकतों से परिचित कराता है। रोजे में ही इंसान को पता चलता है कि भूख क्या है, तकलीफ की शिद्दत किसे कहते हैं। प्यास लगने से क्या होता है। जब आदमी इन तकलीफों से स्वयं गुजरता है तो उसे दूसरे की तकलीफ का आभास होता है और वह एक दूसरे के कष्ट व तकलीफ के समय उसके काम आता है।

चांद के दीदार करने को तलाशती रही नजरें

शनिवार शाम सूर्य डूबते ही लोग अपने-अपने घरों के छत एवं खाली जगहों पर खड़े होकर रमजान का चांद के दीदार के लिए लोग बेताब दिखे। कहीं चांद के दीदार से तो कहीं चांद दिखने का एलान होते ही सभी के चेहरे पर मुस्कान छा गयी। चांद के देखे जाने की खबर मिलते ही लोग रमजान की तैयारी में जुट गये। लोगों ने एक-दूसरे को गले लग कर रमजान की बाधाइयां दी। जल्दी -जल्दी लोग अपना -अपना कामकाज निपटारा कर ईशा की नमाज एवं माह-ए-रमजान में तीस रात तक पढ़ी जाने वाली तरावीह की नमाज अदा किए।