भिवंडी: तो डूब जाएगा पावर लूम कारखाना ?

स्पेशल रिपोर्ट, इकबाल अहमद

भिवंडी, महाराष्ट्र

बंदी का असर
पावर लूम उद्योग में चल रही मंदी से परेशान मालिकों ने हड़ताल पर जाने का फैसला किया था। शहर के सभी पावर लूम 16 अगस्त से बंद हैं। पावर लूम में हुई पिछली हड़तालों पर नज़र डाले तो इस बार बंदी बहुत कामयाब रही। शहर के इक्का-दुक्का कारखाने छोड़ दे तो करीब 5 लाख पावर लूम पूरी तरह से बन्द है। भिवंडी में पावर लूम में बनने वाला काटन का कपड़ा सबसे ज़्यादा मंदी की मार झेल रहा था। दूसरी तरफ शूटिंग-शर्टिंग बनाने वाले पावर लूम मालिक बन्दी को बहुत महत्व नहीं दे रहे थे।

हड़ताल तोड़ने की साजिश  
भिवंडी के पावर लूम बन्दी में सबसे ज़्यादा नुकसान गुजरात की बिजली वितरण करने वाली कंपनी टोरेंट पावर लिमिटेड का हो रहा था। पावर लूम मालिक बताते हैं कि बिजली वितरण कंपनी टोरेंट पावर लिमिटेड पहले से ही प्रयास कर रही थी कि पावर लूम की हड़ताल न हो, लेकिन जब हड़ताल हो गई तो बंदी को असफल बनाने के लिए कंपनी ने प्रयास शुरु कर दिए। इस काम में उसे गुजरती कंपनी होने का फायदा मिला। भिवंडी के गुजरती लूम मालिक कई जगहों पर लूम चालू करने लगे। इससे शहर का नौजवान उत्तेजित होने लगा। कई जगहों पर मारपीट और गाली-गलौच की नौबत भी आई। गुजरती लूम मालिक अपनी फरियाद लेकर बीजेपी सांसद के दरबार में पहुँच गए।

इस बीच व्हाट्सअप पर एक सन्देश फैलने लगा कि जो भी मालिक अपना पावर लूम चालू रखना चाहता है, वो चालू रखे। अगर कोई जबरन बन्द कराने की कोशिश करता है तो स्थानीय बीजेपी के सांसद और विधायक को सुचना दे। इस सन्देश की सुचना जब भिवंडी के दूसरे पावर लूम मालिकों को हुई तो उन्होंने बीजेपी सांसद के घर पर ही 22 अगस्त को संघर्ष समिति की बैठक बुलाई। ये बैठक देर रात तक चली। इस बैठक में गुजराती लूम मालिकों ने बंदी का पूरी तरह से विरोध किया। गुजरती लूम मालिकों को खुश करने के लिए स्थानीय सांसद ने खुद के पहले लिए गए फैसले को बदलते हुए 31 अगस्त तक बन्द रहने वाले पावर लूम की समय सीमा घटा कर 26 अगस्त तक कर दिया।

मज़दूरों का पलायन
इस उहापोह के बीच पावर लूम मज़दूरों का पलायन जारी है। शहर के सबसे नजदीक कल्याण स्टेशन पर यूपी, बिहार समेत अन्य राज्यों को जानी वाली सभी ट्रेनों में सुबह से रात तक जाने वालों मज़दूरों का तांता लगा रहता है। दरअसल पावर लूम मज़दूरों के पास कोई दूसरा काम नहीं है। हड़ताल के बाद उनके सामने खाने पीने की समस्या पैदा हो गई है। दूसरी तरफ पावर लूम मालिक मंदी की मार की वजह से मज़दूरों को रोकने के लिए एडवान्स भी नहीं दे पा रहे हैं। यहां के होटलों ने उधारी बंद कर दी है, उन्हें पहले से फंसे पैसे मिलने के आसार नहीं लग रहे हैं। मज़दूरों के पास ज़रूरत के दूसरे सामान भी नहीं हैं। ऐसे में उनके पास शहर छोड़ने के अलावा कोई दूसरा चारा नहीं बचा है।

क्या बचेगा पावर लूम उद्योग ?
पावर लूम की बंदी को एक हफ्ते से ज़्यादा हो गए हैं। पावर लूम मालिक बेहद परेशान हैं, उन्हें कोई रास्ता नहीं दिखाई दे रहा है। इन सब के बीच सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि अब तक न तो राज्य सरकार का और न ही केन्द्र सरकार को कोई अधिकारी या प्रतिनिधि शहर के हालात और पावर लूम मालिकों की स्थिति देखने आया। शहर में सांसद से लेकर विधायक सत्तासीन पार्टी के हैं, उसके बावजूद सरकार की ये बेरुखी ने पावर लूम मालिकों को परेशान कर रखा है। मालिकों से बात करने पर उनके चेहरे पर शिकन साफ दिखाई देती है। पावर लूम मालिक अब सवाल कर रहे हैं कि जब सरकार ही कोई कदम नहीं उठा रही है, तो वो इस मंदी से कैसे उबर पाएंगे।

अन्त में….
पावर लूम की मंदी से कोई एक वर्ग या समुदाय परेशान है, ऐसा नहीं है। इसका असर सभी पर हो रहा है। इस कारोबार में सभी धर्म और विभिन्न प्रदेश के लोग जुड़े है। सरकार की उपेक्षा से लगता है पावर लूम भी मुसलमान हो गया है। दूसरी तरफ भिवंडी पावर लूम संघर्ष समिति में फूट पैदा करने की कोशिश ने इस उद्योग के भविष्य को लेकर कई चिंताओं को जन्म दिया है। पावर लूम मालिकों ने जो अच्छे दिन की उम्मीद की थी, वो अब खत्म होती जा रही है।